कोर्ट ऑर्डर रिजर्व का मतलब क्या है? Court order Reserve ka kya matlab hai


कोर्ट ऑर्डर रिजर्व का मतलब क्या है? 

कोर्ट ऑर्डर रिजर्व प्रक्रिया  किसी कोर्ट में सुने गए केस से सम्बन्धित होती है।  यह किसी न्यायालय में सुने गए केस के सम्बन्ध में फैसला सुनाने को लेकर की गयी अंतिम तैयारी है ।

किसी केस से सम्बन्धित ऑर्डर रिजर्व से तात्पर्य है कि उस केस से सम्बन्धित सभी वकीलों की दलीलें सुनने की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है और अब न्यायाधीश को अब किसी निष्कर्ष पर पहुंचना है। 
कभी कभार यह भी होता है कि किसी केस से सम्बन्धित सभी पक्षों को सुनने के बाद जज ओपन कोर्ट में ही कोई फैसला हाथों हाथ सुना देते हैं।  ऐसा तब देखने को मिलता है जब कोई केस कम समय में सुना गया हो और इसी दौरान न्यायाधीश किसी निष्कर्ष पर पहुंच गए हों। हाथों हाथ ओपन कोर्ट में  सुनाए जाने फैसले भी प्रायः कम शब्दों वाले होते हैं और उन्हे आसानी से व्याख्यायित किया जा सकता है। 

कोर्ट ऑर्डर रिजर्व क्यों किया जाता है? 

कोर्ट ऑर्डर रिजर्व सामान्यतया तब किया जाता है जब कोई केस की सुनवाई लंबे समय तक हुई हो और उसमें कई वकीलों की दलीलों को नोट किया गया हो। 
कोर्ट यदि लंबे समय तक सुनी गयी दलीलों पर बहुत जल्द निष्कर्ष
 तक पहुंचने में थोड़ा समय चाहता है तो फैसला रिजर्व होता है। 
इसके बाद केस से सम्बन्धित दलीलों की जज अपने अनुसार व्याख्या करते हैं और स्वविवेक और संविधान में निहित प्रावधानों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। 


किसी केस का ऑर्डर रिजर्व होने के बाद यही सवाल उठता है कि उस केस का फैसला कब डिलिवर होगा तो इसमें में न्यायाधीश के पास कोर्ट ऑर्डर डिलिवर करने के लिए अधिकतम समय सीमा भी होती है। 
कोई कोर्ट किसी ऑर्डर को अधिकतम 90 कार्य दिवस तक रिजर्व रख सकता है और यह समय सीमा समाप्त होने से पहले जज को फैसला सुनाना होता है। 
यह जज पर निर्भर करता है कि वो केस का फैसला रिजर्व होने के कितने दिन बाद सुना दें। 
यदि जज किसी केस को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं तो वे 5- 30 दिन के भीतर भी फैसला सुना देते हैं।