बुलाती है मगर जाने का नहीं |राहत इंदौरी की शायरी बुलाती है जाने का नई | Bulaati hai magar jaane ka nahin |बुलाती है जाने का नहीं

वो बुलाती है मगर जाने का नहीं शायरी किसने लिखी है? 
यह लाइनें जाने माने शायर राहत इंदोरी जी द्वारा लिखित हैं। 
आजकल इस शायरी को तमाम जगह उपयोग किया जाता है। 
इस शायरी का विस्तृत रूप इस प्रकार है। 


बुलाती है मगर जाने का नहीं 
ये दुनिया है, इधर जाने का नहीं 


मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर 
मगर हद से गुजर जाने का नहीं 


कुशादा ज़र्फ़ होना चाहिए 
छलक जाने का भर जाने का नहीं 


सितारें नोच कर ले जाऊँगा 
मैं खाली हाथ घर जाने का नहीं 


वबा फैली हुई है हर तरफ 
अभी माहौल मर जाने का नहीं 


वो गर्दन नापता है नाप ले 
मगर जालिम से डर जाने का नहीं 

– राहत इन्दौरी

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